इतिहास :

१८९९ के मथुरा अधिवेशन से आरम्भ भारत जैन महामण्डल का सफर निरंतर प्रवाहमान होता गया | देश भर में शाखाओं की स्थापना होती गयी | देश के विभिन्न भागों में अधिवेशन करने के दूरदर्शी चिंतन ने महामण्डल को निरन्तर विस्तार दिया | १८९९ से २०१२ के ५३वें अधिवेशन तक महामण्डल ने मुंबई में ९, वर्धा में ४, मथुरा में ३, मेरठ, कोलकाता, जयपुर, लखनऊ, हैदराबाद, ब्यावार, जामनेर में २-२ तथा हिसार, अंबाला, सहारनपुर, सूरत, मुजफ्फरनगर, बनारस, नागपुर, बीकानेर, अमरावती, यवतमाल, इटारसी, चेन्नई, मुराड, बुलढाना, उदयपुर, चदंवाड़, सांगली, जोधपुर, इन्दौर, दिल्ली में एक-एक अधिवेशन किया |


सौ से अधिक वर्षों के उज्ज्वल इतिहास के पृष्ठ जैन एकता के उददेश्य से एक प्रतीक, एक ध्वज, एक ग्रंथ व एक मंच जैसे घटनाक्रमों के साथ संवत्सरी एकता, अहिंसा प्रचार-प्रसार के कार्यक्रम आदि अनेकों विशिष्ठ घटनाक्रम समेटे हुए हैं | आज महामण्डल वर्तमान युग की आवश्यकताओं के अनुरुप अपने मिशन में पूरी तरह संलग्न है |


एक सौ बारह वर्षो के इस सफर में जैन समाज के अनेकों शिखर पुरुषों यथा रायबहादुर श्री सुलतान सिंहजी, सेठ द्वारकादास रईस,श्री गुलाबचंदजी ढड्डा, सेठ अचलसिंहजी, श्री कुन्दनमलजी फिरोदिया, श्री श्रषभदास रांका, साहू श्रेयांसप्रसाद जैन, सेठ लालचंद हिराचंद दोशी, श्री सोहनलाल दुग्गड, श्री अभयकुमारजी कासलीवाल, श्री दीपचंद एस. गार्डी श्री नृपराज एस. जैन, श्री किशोरचन्द्र वर्धन, श्री रमेश जैन, श्री सुभाषचन्द्र रुणवाल, श्री आर. के. जैन, श्री चम्पालाल वर्धन आदि ने इस संस्थान के योगक्षेम में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं |


भूतपूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष

श्री दीपचंद एस. गार्डी
सन् १९८३
श्री नृपराज
एस. जैन
स्व. रमेशचंद
जैन
सन् १९९२
स्व. श्री किशोरचन्द्र वर्धन
सन् १९९६
स्व. श्री पन्नालाल सुराणा
सन् २००२

श्री
आर. के. जैन
सन् २००५


       
श्री चम्पालाल
वर्धन
सन् २००८